
Wednesday, December 30, 2009
Saturday, December 26, 2009
Saturday, December 19, 2009
Friday, December 18, 2009
Wednesday, December 9, 2009
देवेश शास्त्री

जीवनी
कर्णाटक के राज्यपाल महामहिम श्री टी एन चतुर्वेदी द्वारा इटावा हिन्दी सेवा निधि की ओर से २००२ में सम्मानित साहित्यकार श्री देवेश शास्त्री का जन्म २२ अक्तूबर १९६८ (कार्तिक वदीअमावस्या सं२०२५ ) दीपावली की रात में कानपुर मंडल के इटावा नगर में ओज के मूर्धन्य कवि श्री शिव शरण अवस्थी ( पंगुजी) के अग्रज श्री राम शरण अवस्थी के यहाँ हुआ था। शैशव काल से ही देवेश को पूर्णरूपेण साहित्यिक वातावरण मिला, देशा के प्रतिष्ठित कलमकारों ने उसे गोद में खिलाया। पंगुजी शारीरिक रूप से विकलांग थे लिहाजा स्वयं कवि लेखक उनके लालपुरा चौक, इटावा स्थित आवास पर आते रहते थे। बचपन से ही काव्य घुट्टी पीने वाले शास्त्री जी १९८४ से लगातार मंचों पर काव्य पाठ करते आ रहे हैं । ८० के दशक के उत्तरार्ध में आपकी रचनाएँ आकाशवाणी, लखनऊ से प्रसारित हुई देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लगातार रचनाएँ प्रकाशित हो रही हैं। जिलास्तरीय साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों को श्री शास्त्री जारी रखे हैं। इन दिनों वे विभिन्न दर्शनों के सारभूत ऐष्टिकदर्शन प्रस्तुत करते हुए गृहस्थ संत के रूप में सतसंग व्याख्यान व प्रवचन दे रहे है ।
कविता १
कैसा हा-हाकार है
ये कैसा है कोलाहल कैसा हां-हाकार है ।
चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥
निहित स्वार्थ वश हिंसा बढ़ती। बहकावे में जनता मरती ।
खून की नदियाँ यहाँ उफनती। मन में संकीर्णता पनपती।
मर्यादा के ऊपर कुर्सीराग का बज्र प्रहार है।
चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥
कोई खाली पेट तड़पता। दो रोटी के लिए झगड़ता ।
बड़े पेट से दबकर मरता। घुट-घुट करके प्राण निकलता।
शोषक डंडीमार पनपता बढ़ता धन भंडार है।
चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥
गिरता है शिक्षा का स्तर। तुष्टीकरण बनाता बदतर।
सुलग उठा है शिक्षा परिसर। राजनीत छात्रों के सर पर।
मेधा कुंठित होती अब तो ज्ञान दान व्यापार है।
चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥
आरक्षी बल स्वयं अरक्षित। अपराधी खादी संरक्षित।
भुला दिए सब जनता के हित। घटनाएँ बढ़ चली अपरमित।
मुल्जिमान को खुली हवा सज्जन को कारागार है।
चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥
कैसा भी हो काम कराना। जीते को चाहे हरवाना।
मरे को भी जिंदा करवाना। दफ्तर बैंक कचहरी थाना।
काले धन के स्रोत उजागर घूसखोर व्यवहार है।
चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥
कहने को तो अभी बहुत है। अपनी भी तो बुरी नियत है।
विजय वरन कर रहा असत है। इनमें उनकी कहाँ बकत है।
निंदक नियरे नहीं चाटुकारों को मिलता प्यार है।
चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥
-देवेश शास्त्री
कविता २
हुई सुहानी शाम
बाप खुशी से झूमता , पीकर प्यारे जाम।
मिला बजीफा पूत को हुई सुहानी शाम॥
हुई सुहानी शाम, काम अब राम करेंगे,
सरकारी स्कीमें पाकर पेट भरेंगे,
दंद फंद ही जीवन उनका दाम उसी से।
नाकारा ये बाप देखिये मगन खुशी से॥
देवेश शास्त्री
कविता ३
नक़ल
खुली नक़ल से देखिये, ढेरों पाये अंक।
अंकपत्र पा खुश हुए बुद्धि शून्य मन रंक॥
बुद्धिशून्य मन रंक, डंक सा मारे जग सब,
खडे निरुत्तर पूछे जाते यहाँ प्रश्न जब,
नजर चुराते दिखे चोर सम वही विकल से।
लूटे जिसने अंक भयंकर खुली नक़ल से॥
देवेश शास्त्री
कविता ४
सदाचार का पाठ पदाते युग के युग बीते हैं
दुराचार की अति के आगे सदघट सब रीते हैं
नहीं पाठ्यक्रम सफल हो सके सिद्ध प्रयोग हुए हैं
कटु औषधि के द्बारा ही मन-देह निरोग हुए हैं
असत, अधर्म, भ्रष्टता, आपाधापी बहुत गा चुके
अलंकरण सम्मान, प्रशस्ती आख़िर बहुत पा चुके
बंद करो यह पाठ पढाना बिगुल फूंक दो रन का
सत्य धर्म की ध्वजा उठाकर पालन होवे प्रण का
जब संघर्ष छेड़ दोगे तब निश्चित जे पाओगे
अगर नियति कह रहे टालते भय पर भय खाओगे
कलम मार्ग दर्शक है तो फ़िर तोप बनानी होगी
स्याही की बूंदें बम की सामर्थ्य समानी होगी
माखन-लेपन नहीं मित्र पेट्रोल छिड़कना होगा
चांदी नहीं, चर्म का जूता जमकर जड़ना होगा
लंका में चढ़कर ही रावण को सदगति देनी होगी
दह में कूद कालिया नथ यमुना पवित्र करनी होगी
असत अधर्म अकर्म दुर्ग पर चढ़ परचम लहराओ
सत्यमेव जयते सार्थक कर धर्म ध्वजा फहराओ
-देवेश शास्त्री
कविता ५
जैसी है करनी रही वैसा फल का स्वाद
सदकर्मों के गुणों की भी होती है म्याद
सुख जाने पर दुखों का निश्चित है आरम्भ
क्षणिक सफलता पर अहो क्यों है इतना दंभ
दम्भित सम्पाती उडा पाने को मार्तंड
जरे पंख व्याकुल गिरा अपनाया भूखंड
उधर जटायू साधु मन दंभ रहित हरिदास
परहित पंख कटाय के पावा प्रभु-आवास
जरे-कटे निरपक्ष भै दोनों भाई गिद्ध
दुखद सुखद तन पीर को सहज करिगाये सिद्ध
शिवि बन तन कर्तन करें मन मत होय अधीर
अंत: ब्रह्म निवास है खुद से कह लो पीर
-देवेश शास्तरी
कविता
सम्पति के अभिमान में, झूम रहे श्रीमान
नहीं समझते किसी को, चला रहे अभियान
चला रहे अभियान, मान सम्मान न जानें
दिया मूत का जला जला के, पर के तानें
कहें सुकवि देवेश चैन नहि है दम्पति को
जाना खाली हाथ, जोड़ते गिन सम्पति को
- देवेश शास्तरी
कविता ७
धन वालो के मन बुरे, रहते मद में चूर
सम्पति के अभिमान में, स्वाभिमान से दूर
स्वाभिमान से दूर, मानते धन को सरबस
धर्म-कर्म का मात्र दिखावा करते बरबस
मक्खी से भी दूध चूसते, कंगालों के
रहते मद में चूर , बुरे मन धन वालो के
-देवेश शास्त्री
कविता ८
मक्खन महंगा हो गया दूध दही है लुप्त।
मक्खनबाजी चल गई, मेधा कुंठित सुप्त।
मेधा कुंठित सुप्त, कहाँ उनकी है गिनती।
किया धरा बेकार सुनी जाती न विनती।
इनके आगे दुनियाभर के सब हैं ढक्कन।
पाना है कुछ मित्र चपेटो जमकर मक्खन॥ -देवेश शास्त्री
कविता ९
असली मक्खन है कहाँ, सिंथेटिक जब दूध
पर दुरुस्त है हाजमा, रकम हजम मय सूद
रकम हजम मय सूद , हाथ जब उनका ऊपर
काटी जमकर मौज, रोज नाचे चढ़ सर पर
मक्खनबाजी करके उपजे नेता फसली
दल बदलू जब नीति, नहीं मक्खन है असली
-देवेश शास्त्री
Monday, November 30, 2009
Monday, November 16, 2009
Wednesday, November 11, 2009
Monday, September 28, 2009
नहीं ही पा रहा रावण-दहन
रामलीला मैदान में एकत्रित हजारों दर्शक,
राम और रावण में चला काफी देर युद्ध ,
मंच के नजदीक बना था रावण का पुतला जो बन उस वक्त तमाशा
जब काफी मशक्कत के बाद भी नही फुक पाया
फुका भी, तो आधा - अधूरा ।
लोग ठहाका मारकर हंसपड़े , बात ही कुछ ऐसी थी ।
मेरे मन में विचार आया - अब न्याय के हाथों अन्याय , सद्वृत्ति के हाथों दुर्वृत्ति,
सत्य के हाथों असत्य व सदाचार के हाथों आनाचार का दहन मुश्किल है ,
किंतु काफ़ी जद्दोजहद के बाद पुतला फुक दिया गया।
तब विचार इस निष्कर्ष पर पहुचा सत्य, न्याय, सद्वृत्ति व सदाचार जीतेंगे मगर परेशान कितने ही क्यों न हों।
Wednesday, September 23, 2009
हुई सुहानी शाम
मिला बजीफा पूत को हुई सुहानी शाम॥
हुई सुहानी शाम, काम अब राम करेंगे,
सरकारी स्कीमें पाकर पेट भरेंगे,
दंद फंद ही जीवन उनका दाम उसी से।
नाकारा ये बाप देखिये मगन खुशी से॥
देवेश शास्त्री
नक़ल
अंकपत्र पा खुश हुए बुद्धि शून्य मन रंक॥
बुद्धिशून्य मन रंक, डंक सा मारे जग सब,
खडे निरुत्तर पूछे जाते यहाँ प्रश्न जब,
नजर चुराते दिखे चोर सम वही विकल से।
लूटे जिसने अंक भयंकर खुली नक़ल से॥
देवेश शास्त्री
Monday, September 21, 2009
Monday, August 31, 2009
Monday, August 10, 2009
Saturday, August 8, 2009
Friday, August 7, 2009
Friday, July 24, 2009
कैसा हां-हाकार है
चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥
निहित स्वार्थ वश हिंसा बढ़ती। बहकावे में जनता मरती ।
खून की नदियाँ यहाँ उफनती। मन में संकीर्णता पनपती।
मर्यादा के ऊपर कुर्सीराग का बज्र प्रहार है।
चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥
कोई खाली पेट तड़पता। दो रोटी के लिए झगड़ता ।
बड़े पेट से दबकर मरता। घुट-घुट करके प्राण निकलता।
शोषक डंडीमार पनपता बढ़ता धन भंडार है।
चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥
गिरता है शिक्षा का स्तर। तुष्टीकरण बनाता बदतर।
सुलग उठा है शिक्षा परिसर। राजनीत छात्रों के सर पर।
मेधा कुंठित होती अब तो ज्ञान दान व्यापार है।
चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥
आरक्षी बल स्वयं अरक्षित। अपराधी खादी संरक्षित।
भुला दिए सब जनता के हित। घटनाएँ बढ़ चली अपरमित।
मुल्जिमान को खुली हवा सज्जन को कारागार है।
चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥
कैसा भी हो काम कराना। जीते को चाहे हरवाना।
मरे को भी जिंदा करवाना। दफ्तर बैंक कचहरी थाना।
काले धन के स्रोत उजागर घूसखोर व्यवहार है।
चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥
कहने को तो अभी बहुत है। अपनी भी तो बुरी नियत है।
विजय वरन कर रहा असत है। इनमें उनकी कहाँ बकत है।
निंदक नियरे नहीं चाटुकारों को मिलता प्यार है।
चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥
-देवेश शास्त्री
Friday, July 10, 2009
दिव्य शक्ति प्रताप १० (शक्ति-प्रताप)
बस इसी तरह राणा प्रताप निज भ्रातहीन भा पाता है ॥
वह शक्तिसिंह राणानुज था जो अरि का जाकर मित्र बना।
घर का ही निज घर की खातिर आख़िर ये शक्ती शत्रु बना॥
जब झाला ने अरि-युद्ध किया राणा घोड़ा ले भाग चला।
दो सैनिक शक्तिसिंह साथी दौडे पीछे पहचान कला॥
पीछे मुड़कर देखा राणा निज अनुज शक्तिमय यवन वीर ।
दुखपूर्ण ह्रदय अरू श्रमित गात फ़िर भी छोडा था नहीं धीर ॥
अति तीव्र वेग हयटाप शब्द अरु धूली नभ में छाती थी।
मेघाच्छादित लग रहा गगन वह दृश्य अनुपमा पाती थी॥
इतने में नाला गहन पड़ा पल में जब घोडा लाँघ गया ।
पर अपर पार जाते ही वह हय श्रमित शीघ्र परलोक गया॥
जा शक्तिसिंह ने पैरों पड़ माफी मांगी राणाजी से।
हय दे किया फरार भ्रात सैनिक लौटे उस अवनी से॥ ।
हो गए धन्य परताप शक्ति इतिहास में नाम सुशोभित है।
करना गौरव गाथा का गान हम भारतीयों का यूँ हित है॥
Thursday, July 9, 2009
दिव्य शक्ति प्रताप ११ (हल्दीघाटी)
वह रणस्थली सबकी प्रिय है कर सैनिक दल का रक्तपान॥
हे कातर पराधीनता नर-प्रेमी, मत थल स्पर्श करो।
धिक्कार तुम्हें करती घाटी, स्वारथ-परता की अग्नि जारो॥
हा-हा करके जो वीर मरे उनके चरित्र को याद किया।
करते करते स्मरण भूमि ने आख़िर ख़ुद ही मौन लिया॥
उस हल्दीघाटी के प्रस्तर, खंडों पर रक्तिम याद आज।
इतिहास अमर है नाम तेरा वन -वन घूमा तज राज काज ॥
लेखानावधि
२ ४ ० २
भुज वेद गगन उरु पौष शुक्ल तिथि दशमी वासर सुभग इंदु।
देवेश कथा प्रारंभ करी सर झुका सरस्वती पदारविंद ॥
पर हुई समाप्त ज्येष्ठ कृष्णी अष्टमी तैतालिस।
लम्बावधि का कारण इक-दो ही छंद लिखे हर एक दिवस॥
देवेश शास्त्री
(संस्कृत के प्रकांड विद्वान् कवि श्री श्रीश जी द्वारा रचित खंडकाव्य प्रताप विजय
पूर्वमाध्यमा के कोर्स में है श्री देवेश जी जब पूर्वमाध्यमा में पड़ते थे तब उन्होंने
अध्ययं के साथ पौष शुक्ल १० संवत २०४२ को काव्यानुवाद प्रारंभ किया था।
जो ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी संवत २०४३ विक्रम को पूर्ण हुआ।)
Wednesday, July 8, 2009
Tuesday, July 7, 2009
Monday, July 6, 2009
शास्त्री जी की जीवनी
Thursday, July 2, 2009
धर्म ध्वजा फहराएं
दुराचार की अति के आगे सदघट सब रीते हैं
नहीं पाठ्यक्रम सफल हो सके सिद्ध प्रयोग हुए हैं
कटु औषधि के द्बारा ही मन-देह निरोग हुए हैं
असत, अधर्म, भ्रष्टता, आपाधापी बहुत गा चुके
अलंकरण सम्मान, प्रशस्ती आख़िर बहुत पा चुके
बंद करो यह पाठ पढाना बिगुल फूंक दो रन का
सत्य धर्म की ध्वजा उठाकर पालन होवे प्रण का
जब संघर्ष छेड़ दोगे तब निश्चित जे पाओगे
अगर नियति कह रहे टालते भय पर भय खाओगे
कलम मार्ग दर्शक है तो फ़िर तोप बनानी होगी
स्याही की बूंदें बम की सामर्थ्य समानी होगी
माखन-लेपन नहीं मित्र पेट्रोल छिड़कना होगा
चांदी नहीं, चर्म का जूता जमकर जड़ना होगा
लंका में चढ़कर ही रावण को सदगति देनी होगी
दह में कूद कालिया नथ यमुना पवित्र करनी होगी
असत अधर्म अकर्म दुर्ग पर चढ़ परचम लहराओ
सत्यमेव जयते सार्थक कर धर्म ध्वजा फहराओ
-देवेश शास्त्री
परकें तानें
नहीं समझते किसी को, चला रहे अभियान
चला रहे अभियान, मान सम्मान न जानें
दिया मूत का जला जला के, पर के तानें
कहें सुकवि देवेश चैन नहि है दम्पति को
जाना खाली हाथ, जोड़ते गिन सम्पति को
- देवेश शास्त्री
रहते मद में चूर
सम्पति के अभिमान में, स्वाभिमान से दूर
स्वाभिमान से दूर, मानते धन को सरबस
धर्म-कर्म का मात्र दिखावा करते बरबस
मक्खी से भी दूध चूसते, कंगालों के
रहते मद में चूर , बुरे मन धन वालो के
-देवेश शास्त्री
मक्खनबाजी १
पर दुरुस्त है हाजमा, रकम हजम मय सूद
रकम हजम मय सूद , हाथ जब उनका ऊपर
काटी जमकर मौज, रोज नाचे चढ़ सर पर
मक्खनबाजी करके उपजे नेता फसली
दल बदलू जब नीति, नहीं मक्खन है असली
-देवेश शास्त्री
मक्खनबाजी
मक्खनबाजी चल गई, मेधा कुंठित सुप्त।
मेधा कुंठित सुप्त, कहाँ उनकी है गिनती।
किया धरा बेकार सुनी जाती न विनती।
इनके आगे दुनियाभर के सब हैं ढक्कन।
पाना है कुछ मित्र चपेटो जमकर मक्खन॥
-देवेश शास्त्री
ख़ुद से कह लो पीर
सदकर्मों के गुणों की भी होती है म्याद
सुख जाने पर दुखों का निश्चित है आरम्भ
क्षणिक सफलता पर अहो क्यों है इतना दंभ
दम्भित सम्पाती उडा पाने को मार्तंड
जरे पंख व्याकुल गिरा अपनाया भूखंड
उधर जटायू साधु मन दंभ रहित हरिदास
परहित पंख कटाय के पावा प्रभु-आवास
जरे-कटे निरपक्ष भै दोनों भाई गिद्ध
दुखद सुखद तन पीर को सहज करिगाये सिद्ध
शिवि बन तन कर्तन करें मन मत होय अधीर
अंत: ब्रह्म निवास है खुद से कह लो पीर
-देवेश शास्त्री



















