devesh shastri

Monday, September 28, 2009

नहीं ही पा रहा रावण-दहन

दशहरा मेला
रामलीला मैदान में एकत्रित हजारों दर्शक,
राम और रावण में चला काफी देर युद्ध ,
मंच के नजदीक बना था रावण का पुतला जो बन उस वक्त तमाशा
जब काफी मशक्कत के बाद भी नही फुक पाया
फुका भी, तो आधा - अधूरा ।
लोग ठहाका मारकर हंसपड़े , बात ही कुछ ऐसी थी ।
मेरे मन में विचार आया - अब न्याय के हाथों अन्याय , सद्वृत्ति के हाथों दुर्वृत्ति,
सत्य के हाथों असत्य व सदाचार के हाथों आनाचार का दहन मुश्किल है ,
किंतु काफ़ी जद्दोजहद के बाद पुतला फुक दिया गया।
तब विचार इस निष्कर्ष पर पहुचा सत्य, न्याय, सद्वृत्ति व सदाचार जीतेंगे मगर परेशान कितने ही क्यों न हों।

Wednesday, September 23, 2009

हुई सुहानी शाम

बाप खुशी से झूमता , पीकर प्यारे जाम।
मिला बजीफा पूत को हुई सुहानी शाम॥
हुई सुहानी शाम, काम अब राम करेंगे,
सरकारी स्कीमें पाकर पेट भरेंगे,
दंद फंद ही जीवन उनका दाम उसी से।
नाकारा ये बाप देखिये मगन खुशी से॥
देवेश शास्त्री

नक़ल

खुली नक़ल से देखिये, ढेरों पाये अंक।
अंकपत्र पा खुश हुए बुद्धि शून्य मन रंक॥
बुद्धिशून्य मन रंक, डंक सा मारे जग सब,
खडे निरुत्तर पूछे जाते यहाँ प्रश्न जब,
नजर चुराते दिखे चोर सम वही विकल से।
लूटे जिसने अंक भयंकर खुली नक़ल से॥
देवेश शास्त्री