devesh shastri

Wednesday, September 23, 2009

नक़ल

खुली नक़ल से देखिये, ढेरों पाये अंक।
अंकपत्र पा खुश हुए बुद्धि शून्य मन रंक॥
बुद्धिशून्य मन रंक, डंक सा मारे जग सब,
खडे निरुत्तर पूछे जाते यहाँ प्रश्न जब,
नजर चुराते दिखे चोर सम वही विकल से।
लूटे जिसने अंक भयंकर खुली नक़ल से॥
देवेश शास्त्री

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