मैं अकिंचन कुछ नहीं
सब कुछ तो उसका है। मैं हूँ उसका , वह है मेरा, सब कुछ।
वह जो चाहे, वह ही होता, वृथा दंभ क्यों पालें?
न तो कवी हूँ , न ही लेखक, और न ही उपदेशक हूँ।
सच में मैं जो लिखता, गाता, कहता, सहता यानि सारी क्रिया-प्रतिक्रिया
उसकी मर्जी से होती है। मैं उसी नट के हाथ में बंधी डोरी की कठपुतली हूँ।
Friday, January 29, 2010
Tuesday, January 12, 2010
Subscribe to:
Comments (Atom)

