devesh shastri

Monday, May 14, 2012

अकूत संपदा में �पद्मनाभ मंदिर� समान है ��नरसिंह मंदिर अस्तल��

भारतीय संस्कृति में धर्म का एक विशेष महत्त्व रहा है और इसीलिए दान का भी महत्त्व रहा है। हमारे मंदिरों की सम्रद्धि सदैव से लुटेरों के आक्रमण का केंद्र रही है! पहले मुस्लिम आक्रान्ताओं ने सोमनाथ मंदिर को कई बार लूटा और अब इस्लामिक और ईसाई गठबंधन केरल के पद्मनाभ मंदिर को लूट रहा है, और देश के हिन्दू ये देख ही नहीं पा रहे हैं कि उनकी संपत्ति को छिना जा रहा है जो कि बाद में इस्लाम और ईसाइयत के प्रचार में लगाई जाएगी। उत्तर भारत में काशी विश्व्नाथ मंदिर, रामजन्मभूमि और कृष्ण जन्मस्थल आदि स्थानों पर हुए मुगल आक्रमण इतिहास के पन्नों में उलटफेर कर दर्शाये जाते रहे। दूसरी ओर उत्तर भारत का एक ऐसा भी मंदिर है जिसे संपदा के अनुसार उत्तर का पद्मनाभ मंदिर कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह है इष्टिकापुरी (इटावा) का नरसिंह मंदिर अस्तल, जिसकी अकूत संपदा ��रहस्य�� है। काफी कुछ महंत परंपरा के चलते खुर्द-बुर्द हो चुकी है, इनमें बेशकीमती आभूषण और कई जिलों में फैली अचल संपदा है। यहां भी अकूत संपदा को लूटने को आलमगीर औरंगजेब आया था, लेकि‍न ईश्वरीय चमत्कार के आगे औरंगजेब नतमस्तक हो गया और उसने मंदिर तोड़ने का इरादा बदल दिया और वार्षिक वजीफे का राजाज्ञा पत्र दिया, जो आज भी है। लंबे समय तक वजीफा मिलता रहा और वैष्णव भक्तों की श्रद्धा-भक्ति से निरंतर संपदा बढ़ती गई। इतिहास के पन्नों से पता चलता है कि रामानुज वैष्णव संप्रदाय का मंदिर 11 वीं शताब्दी का है, रामानुजाचार्य का जीवन परिचय कुछ यूं है- 1017 ई. में रामानुज का जन्म दक्षिण भारत के तिरुकुदूर क्षेत्र में हुआ था। बचपन में उन्होंने कांची में यादव प्रकाश गुरु से वेदों की शिक्षा ली, रामानुजाचार्य आलवन्दार यामुनाचार्य के प्रधान शिष्य थे। गुरु की इच्छानुसार रामानुज ने उनसे तीन काम करने का संकल्प लिया थारू- ब्रह्मसूत्र, विष्णु सहस्रनाम और दिव्य प्रबंधनम की टीका लिखना। उन्होंने गृहस्थ आश्रम त्यागकर श्रीरंगम के यदिराज संन्यासी से संन्यास की दीक्षा ली। मैसूर के श्रीरंगम से चलकर रामानुज शालग्राम नामक स्थान पर रहने लगे। रामानुज ने उस क्षेत्र में बारह वर्ष तक वैष्णव धर्म का प्रचार किया, फिर उन्होंने वैष्णव धर्म के प्रचार के लिए पूरे देश का भ्रमण किया। 1137 ई. में वे ब्रह्मलीन हो गए। रामानुजाचार्य ��रामानुज वैष्णव संप्रदाय के प्रणेता है, अतः यह मंदिर संभवतः 11 वीं शताब्दी में बनाया गया होगा। इष्टिकापुरी (इटावा) के नरसिंह मंदिर अस्तल की ख्याति समूचे भूमंडल में थी, तभी तो आलमगीर औरंगजेब ने इस मंदिर पर आक्रमण किया। जन समुदाय को अपने पक्ष में करने के लिये उसने बाबड़ी पर आकाश में चटाई बिछाकर नमाज पढ़ने का चमत्कार दिखाया। नरसिंह मंदिर अस्तल के महंत त्रिकालदर्शी भिड़ंग ऋषि उस समय यमुना स्नान कर रहे थे, उन्हें जैसे ही आक्रमण की अनुभूति हुई, वैसे ही मृगछालासन और कमंडल लेकर दौड़ते हुए आये और बोले - ��रे धूर्त! बंदकर ये तमाशा।�� औरंगजेब ने जवाब दिया- ��तूझमें ईश्वरीय शक्ति है तो दिखा चमत्कार, मै औरंगजेब हूं। बुत (मूर्तिपूजा) ढोंग है...�� वह कुछ और कहता मगर क्रोध में ऋषि भिड़ंग ने मृगछाला निकटवर्ती कुएं पर आकाश में फैला दी। ऋषि अपने आसन पर चढ़े ही थे, औरंगजेब चटाई सहित वाबड़ी (तालाब) पर जा गिरे मगर डूबे नहीं। ऋषि ने आकाश में बिछे आसन पर संध्या प्रारंभ करते हुए कहा- �� बोल डुबो दूं?�� हाथ में यमुना जल लेकर संकल्प मंत्र पढ़ना शुरू किया तो औरंगजेब चटाई सहित तालाब में डूबने लगा। मुंह से निकला - ��बाबा! बचाओ। बचाओ!!�� मंत्र पूरा होने वाला था, ऋषि भिड़ंग ने संकल्प का रूप बदल दिया-��..... आक्रांतायाः जीवन रक्षणार्थं नभे संध्यां करिष्ये।�� औरंगजेब चटाई सहित अपने आप जल से जमीन पर आ गये चारों ओर राधे-राधे गान होने लगा, औरंगजेब भी गाने लगा। संध्या पूरी होते ही औरंगजेब ऋषि के समक्ष नतमस्तक हुआ, उसने मंदिर को तोड़ने की इच्छा त्यागते हुए तत्काल नरसिंह मंदिर अस्तल, इटावा को नियमित रूप से आर्थिक सहायता (वजीफा) देते रहने का लिखित हुक्मनामा दिया। यह हुक्मनामा मंदिर के गर्भगृह के समक्ष स्थापित मानस्तंभ पर आज तक सुरक्षित है। नरसिंह मंदिर अस्तल, इटावा में ऋषि भिड़ंग के बाद उनके शिष्य गोपाल दास महंत हुए। एक सहस्राब्दी तक नरसिंह मंदिर अस्तल, इटावा में महंत ही सर्वेसर्वा होते थे। 1911 में महंत रामप्रपन्न रामानुज ने विचार किया- हो न हो आने आले महंत निष्ठावान न रह पायें और स्वार्थ पूर्ण महत्वाकांक्षा में मंदिर की गरिमा न गिरा दें। उन्होंने वसीयत की - ��नरसिंह मंदिर अस्तल, इटावा की सारी चल-अचल संपत्ति भगवान नरसिंह महाराज की होगी, व्यवस्था संचालन के लिए ट्रस्ट बनाया जाये, जो महंत को समुचित दिशा निर्देश देता रहे। वसीयत के आधार पर महंत रामप्रपन्न रामानुज ने प्रथम ट्रस्ट बनाया जिसके अध्यक्ष राजा नरसिंह राव बनाये गये, 5 ट्रस्टी थे। चूंकि राजा नरसिंह राव लखना स्टेट के उत्तराधिकार मसले पर प्रीमो सुप्रीम कोर्ट लंदन में बैरिस्टर मोतीलाल नेहरू और ज्योती शंकर दीक्षित के साथ व्यस्त थे, लिहाजा नरसिंह मंदिर अस्तल, इटावा के ट्रस्ट पर कम ध्यान दे पाये। परंपरानुरूप महंत सर्वेसर्वा रहे। ट्रस्ट अस्तित्व में रहे, मगर मोनोपॉली महंतों की चलती रही। महंत जगदीश नारायण, नरसिंह मंदिर अस्तल के 11 वें महंत र्हैं मंदिर की संपदा खुर्द-बुर्द होती रही। महंत जगदीश नारायण 57 वर्ष से महंत पद पर हैं। 1965 में ट्रस्ट के अध्यक्ष राजाराम चौधरी ने एडवोकेट जनरल से परामर्श करते हुए अनुमति मांगी। 1966 में मुकदमा किया, सात वर्ष बाद 1973 में फैसला आया और प्राप्त आवेदनों के आधार ट्रस्ट घोषित किया, राजाराम सहित कई ट्रस्टी काल कवलित हो चुके हैं, लिहाजा अटल बिहारी चौधरी 205 लालपुरा इटावा को अध्यक्ष और ब्रजेश दुबे, भगवानदास शुक्ला, जगदीश गुप्ता, राम अवतार तुलसीपुरा और सुरेंद्र कुमार (जालौन) को अध्यक्ष घोषित किया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा मुकदमा नं0 323/1973 के 6-1-2010 के निर्णय में ट्रस्ट का अनुमोदन हुआ। 13 मई 2012 को ट्रस्ट की आमसभा हुई। �अस्तल� शब्द की पहचान आज अस्तल पुलिस चौकी के रूप में है। पहले अस्तल वार्ड था और अस्तल अखाड़ा था। उत्तर भारत में दक्षिण के पद्मनाभ मंदिर की तरह अकूत संपदा वाला अस्तल मंदिर भी है, यकीन नहीं होता। हो भी तो कैसे, नई और युवा पीढ़ी ने मंदिर देखा ही नहीं। अस्तल में मजबूत चहारदीवारी वाले तीन परकोटों के अंदर नरसिंह महाराज मंदिर का गर्भगृह है, बिल्कुल उसी शैली में जैसा वृन्दावन में रंगनाथ मंदिर चार परकोटों में है। कुछ समय पहले यहां 2-3 स्कूल थे। गौशाला थी, अखाड़ा था, मनमोहक बगीचा था, नरसिंह क्लब द्वारा नाटक होते थे। आज यहां तमाम गैराजे हैं जिनमें खड़ी हैं गाड़ियां, दो धान मील हैं, बहुमंजिली इमारतें और सैकड़ों किरायेदार हैं। बीते 57 वर्ष से महंत बने चले आ रहे जगदीश नारायण ही सर्वेसर्वा हैं अब ट्रस्ट के अस्तित्व में आने से महंतजी व्यथित दिख रहे हैं।

Saturday, March 10, 2012

होली

धू-धू करके आज जल उठी लोकतंत्र की होली।
राजनीति में सभी व्यवस्था अर्थ-तंत्र की हो ली॥
घोटालों की घुटी भांग पी नेता फिरते मस्ती में।
सर्दी में जो ताप रहे थे आग लगाकर बस्ती में॥
कितने प्रह्लादों को नित घुट-घुट कर मरना पड़ता।
खादी में लिपटे दैत्यों को देव मानना पड़ता॥
-देवेश शास्त्री

Sunday, January 29, 2012

ऋतुराज बसंत

चलत सुवात प्रात शीतल सुगंध मंद , मौसम विचित्र मित्र आवत बसंत है।
आतप न शीत रविकिरण सुतप्त होत, मन को लगाके हरि भजत सुसंत हैं॥
तबही कहात ऋतुराज है बसंत ब्रंत , सुकवि देवेश देश हर्षित दिगंत है।
पृथ्वी प्रसन्न स्वागतार्थ ऋतुराज तेरे , तबही तो देखो मंद पवन चलंत है॥
-देवेश शास्त्री, (१ मार्च १९८५)

Friday, January 27, 2012

थप्पड़ नहीं जूता जडिये

कलम मार्ग दर्शक है तो फिर तोप बनानी होगी।
स्याही की बूंदें बम की सामर्थ्य समानी होगी॥
माखन लेपन नहीं मित्र पैट्रोल छिड़कना होगा।
चांदी नहीं चर्म का जूता जमकर जड़ना होगा॥

Wednesday, January 18, 2012

जनसेवक चाहिए लुटेरा नहीं

जो वास्तव में पात्र है , वह क्यों करे प्रयास ?
भीड़ अपात्रों की जुडी , व्यर्थ होय उपहास॥
व्यर्थ होय उपहास, दास को चुनना होगा ,
मतदाताओं को ही, तानाबाना बुनना होगा,
कहें सुकवि देवेश , लुटेरे तो कुपात्र हैं।
खोजो अपने बीच, मिलेंगे जो सुपात्र हैं॥

जागो भैया जागो !

देखो फिर से वे आये हैं जो बना चूतिया चले गए ।
वे पांच वर्ष में ना आये , आये तो हम फिर छले गए॥
अबकी तो जागो हे भैया, इनको तो धूल चटानी है,
ईमानदार को खड़ा करो, भेजो, जो अबतक दले गए॥

Monday, January 16, 2012

राम धारी सिंह दिनकर

हे वीर बन्धु ! दायी है कौन विपद का ?हम दोषी किसको कहें तुम्हारे वध का ?
यह गहन प्रश्न; कैसे रहस्य समझायें ?दस-बीस अधिक हों तो हम नाम गिनायें।पर, कदम-कदम पर यहाँ खड़ा पातक है,हर तरफ लगाये घात खड़ा घातक है।
घातक है, जो देवता-सदृश दिखता है,लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है,जिस पापी को गुण नहीं; गोत्र प्यारा है,समझो, उसने ही हमें यहाँ मारा है।
जो सत्य जान कर भी न सत्य कहता है,या किसी लोभ के विवश मूक रहता है,उस कुटिल राजतन्त्री कदर्य को धिक् है,यह मूक सत्यहन्ता कम नहीं वधिक है।
चोरों के हैं जो हितू, ठगों के बल हैं,जिनके प्रताप से पलते पाप सकल हैं,जो छल-प्रपंच, सब को प्रश्रय देते हैं,या चाटुकार जन से सेवा लेते हैं;
यह पाप उन्हीं का हमको मार गया है,भारत अपने घर में ही हार गया है।
है कौन यहाँ, कारण जो नहीं विपद् का ?किस पर जिम्मा है नहीं हमारे वध का ?जो चरम पाप है, हमें उसी की लत है,दैहिक बल को रहता यह देश ग़लत है।
नेता निमग्न दिन-रात शान्ति-चिन्तन में,कवि-कलाकार ऊपर उड़ रहे गगन में।यज्ञाग्नि हिन्द में समिध नहीं पाती है,पौरुष की ज्वाला रोज बुझी जाती है।
ओ बदनसीब अन्धो ! कमजोर अभागो ?अब भी तो खोलो नयन, नींद से जागो।वह अघी, बाहुबल का जो अपलापी है,जिसकी ज्वाला बुझ गयी, वही पापी है।
जब तक प्रसन्न यह अनल, सुगुण हँसते है; है जहाँ खड्ग, सब पुण्य वहीं बसते हैं।
वीरता जहाँ पर नहीं, पुण्य का क्षय है,वीरता जहाँ पर नहीं, स्वार्थ की जय है।
तलवार पुण्य की सखी, धर्मपालक है,लालच पर अंकुश कठिन, लोभ-सालक है।असि छोड़, भीरु बन जहाँ धर्म सोता है,पातक प्रचण्डतम वहीं प्रकट होता है।
तलवारें सोतीं जहाँ बन्द म्यानों में,किस्मतें वहाँ सड़ती है तहखानों में।बलिवेदी पर बालियाँ-नथें चढ़ती हैं,सोने की ईंटें, मगर, नहीं कढ़ती हैं।
पूछो कुबेर से, कब सुवर्ण वे देंगे ?यदि आज नहीं तो सुयश और कब लेंगे ?तूफान उठेगा, प्रलय-वाण छूटेगा,है जहाँ स्वर्ण, बम वहीं, स्यात्, फूटेगा।
जो करें, किन्तु, कंचन यह नहीं बचेगा,शायद, सुवर्ण पर ही संहार मचेगा।हम पर अपने पापों का बोझ न डालें,कह दो सब से, अपना दायित्व सँभालें।
कह दो प्रपंचकारी, कपटी, जाली से,आलसी, अकर्मठ, काहिल, हड़ताली से,सी लें जबान, चुपचाप काम पर जायें,हम यहाँ रक्त, वे घर में स्वेद बहायें।
हम दें उस को विजय, हमें तुम बल दो,दो शस्त्र और अपना संकल्प अटल दो।हों खड़े लोग कटिबद्ध वहाँ यदि घर में,है कौन हमें जीते जो यहाँ समर में ?
हो जहाँ कहीं भी अनय, उसे रोको रे !जो करें पाप शशि-सूर्य, उन्हें टोको रे !
जा कहो, पुण्य यदि बढ़ा नहीं शासन में,या आग सुलगती रही प्रजा के मन में;तामस बढ़ता यदि गया ढकेल प्रभा को,निर्बन्ध पन्थ यदि मिला नहीं प्रतिभा को,
रिपु नहीं, यही अन्याय हमें मारेगा,अपने घर में ही फिर स्वदेश हारेगा।


किरिचों पर कोई नया स्वप्न ढोते हो ?किस नयी फसल के बीज वीर ! बोते हो ?
दुर्दान्त दस्यु को सेल हूलते हैं हम; यम की दंष्ट्रा से खेल झूलते हैं हम।वैसे तो कोई बात नहीं कहने को,हम टूट रहे केवल स्वतंत्र रहने को।
सामने देश माता का भव्य चरण है,जिह्वा पर जलता हुआ एक, बस प्रण है,काटेंगे अरि का मुण्ड कि स्वयं कटेंगे,पीछे, परन्तु, सीमा से नहीं हटेंगे।
फूटेंगी खर निर्झरी तप्त कुण्डों से,भर जायेगा नागराज रुण्ड-मुण्डों से।माँगेगी जो रणचण्डी भेंट, चढ़ेगी।लाशों पर चढ़ कर आगे फौज बढ़ेगी।
पहली आहुति है अभी, यज्ञ चलने दो,दो हवा, देश की आज जरा जलने दो।जब हृदय-हृदय पावक से भर जायेगा,भारत का पूरा पाप उतर जायेगा;
देखोगे, कैसा प्रलय चण्ड होता है !असिवन्त हिन्द कितना प्रचण्ड होता है !
बाँहों से हम अम्बुधि अगाध थाहेंगे,धँस जायेगी यह धरा, अगर चाहेंगे।तूफान हमारे इंगित पर ठहरेंगे,हम जहाँ कहेंगे, मेघ वहीं घहरेंगे।
जो असुर, हमें सुर समझ, आज हँसते हैं,वंचक श्रृगाल भूँकते, साँप डँसते हैं,कल यही कृपा के लिए हाथ जोडेंगे,भृकुटी विलोक दुष्टता-द्वन्द्व छोड़ेंगे।
गरजो, अम्बर की भरो रणोच्चारों से,क्रोधान्ध रोर, हाँकों से, हुंकारों से।यह आग मात्र सीमा की नहीं लपट है, मूढ़ो ! स्वतंत्रता पर ही यह संकट है।
जातीय गर्व पर क्रूर प्रहार हुआ है,माँ के किरीट पर ही यह वार हुआ है।अब जो सिर पर आ पड़े, नहीं डरना है,जनमे हैं तो दो बार नहीं मरना है।
कुत्सित कलंक का बोध नहीं छोड़ेंगे,हम बिना लिये प्रतिशोध नहीं छोड़ेंगे,अरि का विरोध-अवरोध नहीं छोड़ेंगे,जब तक जीवित है, क्रोध नहीं छोड़ेंगे।
गरजो हिमाद्रि के शिखर, तुंग पाटों पर,गुलमार्ग, विन्ध्य, पश्चिमी, पूर्व घाटों पर,भारत-समुद्र की लहर, ज्वार-भाटों पर,गरजो, गरजो मीनार और लाटों पर।
खँडहरों, भग्न कोटों में, प्राचीरों में,जाह्नवी, नर्मदा, यमुना के तीरों में,कृष्णा-कछार में, कावेरी-कूलों में,चित्तौड़-सिंहगढ़ के समीप धूलों में—
सोये हैं जो रणबली, उन्हें टेरो रे !नूतन पर अपनी शिखा प्रत्न फेरो रे !
झकझोरो, झकझोरो महान् सुप्तों को,टेरो, टेरो चाणक्य-चन्द्रगुप्तों को;विक्रमी तेज, असि की उद्दाम प्रभा को,राणा प्रताप, गोविन्द, शिवा, सरजा को;
वैराग्यवीर, बन्दा फकीर भाई को,टेरो, टेरो माता लक्ष्मीबाई को।
आजन्मा सहा जिसने न व्यंग्य थोड़ा था,


आजिज आ कर जिसने स्वदेश को छोड़ा था,हम हाय, आज तक, जिसको गुहराते हैं,‘नेताजी अब आते हैं, अब आते हैं;
साहसी, शूर-रस के उस मतवाले को,टेरो, टेरो आज़ाद हिन्दवाले को।
खोजो, टीपू सुलतान कहाँ सोये हैं ?अशफ़ाक़ और उसमान कहाँ सोये हैं ?


बमवाले वीर जवान कहाँ सोये हैं ?वे भगतसिंह बलवान कहाँ सोये हैं ?
जा कहो, करें अब कृपा, नहीं रूठें वे,बम उठा बाज़ के सदृश व्यग्र टूटें वे।
हम मान गये, जब क्रान्तिकाल होता है,सारी लपटों का रंग लाल होता है।जाग्रत पौरुष प्रज्वलित ज्वाल होता हैं,शूरत्व नहीं कोमल, कराल होता है।


(परशुराम प्रतीक्षा से)