चलत सुवात प्रात शीतल सुगंध मंद , मौसम विचित्र मित्र आवत बसंत है।
आतप न शीत रविकिरण सुतप्त होत, मन को लगाके हरि भजत सुसंत हैं॥
तबही कहात ऋतुराज है बसंत ब्रंत , सुकवि देवेश देश हर्षित दिगंत है।
पृथ्वी प्रसन्न स्वागतार्थ ऋतुराज तेरे , तबही तो देखो मंद पवन चलंत है॥
-देवेश शास्त्री, (१ मार्च १९८५)
Sunday, January 29, 2012
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