मन-वाणी अरु कर्म से, मिलता सत्य प्रताप।
जिससे मिट जाते रहे, दैहिक-दैविक ताप॥
कालनेमि को देखिये, मन में कपट विशेष।
वेश देख हम पूजते , आते नित नव-क्लेश॥
संत वेश में फिर रहे , कालनेमि के बाप।
दिखता धर्म है बढ़ रहा, लेकिन चढ़ाता पाप॥
Monday, January 16, 2012
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