devesh shastri

Wednesday, December 30, 2009

Wednesday, December 9, 2009

देवेश शास्त्री


नाम- देवेश शास्त्री

जन्म-तिथि २२-१०-१९६८

जन्म स्थान - इटावा (उत्तर प्रदेश )

प्रकाशित पुस्तकें- अपना इटावा (तीन भागों में), वरद पुत्र पंगुजी, नीराजना, ज्ञान ज्योति
अप्रकाशित पुस्तकें - कृष्ण कौमुदी, सुकवि शतक, दिव्य शक्ति प्रताप
सम्मान-
१९९१ युवा समिति इटावा का विवेकानंद सम्मान

१९९३ में रत्नाकर शास्त्री सम्मान

२००२ में इटावा हिन्दी सेवा निधि की ओर से कर्णाटक के राज्यपाल टी एन चतुर्वेदी द्वारा सम्मानित

२००२ में औरैया हिन्दी प्रोत्साहन निधि की ओर से जनपद न्यायाधीश द्वारा सम्मानित

जीवनी

कर्णाटक के राज्यपाल महामहिम श्री टी एन चतुर्वेदी द्वारा इटावा हिन्दी सेवा निधि की ओर से २००२ में सम्मानित साहित्यकार श्री देवेश शास्त्री का जन्म २२ अक्तूबर १९६८ (कार्तिक वदीअमावस्या सं२०२५ ) दीपावली की रात में कानपुर मंडल के इटावा नगर में ओज के मूर्धन्य कवि श्री शिव शरण अवस्थी ( पंगुजी) के अग्रज श्री राम शरण अवस्थी के यहाँ हुआ था। शैशव काल से ही देवेश को पूर्णरूपेण साहित्यिक वातावरण मिला, देशा के प्रतिष्ठित कलमकारों ने उसे गोद में खिलाया। पंगुजी शारीरिक रूप से विकलांग थे लिहाजा स्वयं कवि लेखक उनके लालपुरा चौक, इटावा स्थित आवास पर आते रहते थे। बचपन से ही काव्य घुट्टी पीने वाले शास्त्री जी १९८४ से लगातार मंचों पर काव्य पाठ करते आ रहे हैं । ८० के दशक के उत्तरार्ध में आपकी रचनाएँ आकाशवाणी, लखनऊ से प्रसारित हुई देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लगातार रचनाएँ प्रकाशित हो रही हैं। जिलास्तरीय साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों को श्री शास्त्री जारी रखे हैं। इन दिनों वे विभिन्न दर्शनों के सारभूत ऐष्टिकदर्शन प्रस्तुत करते हुए गृहस्थ संत के रूप में सतसंग व्याख्यान व प्रवचन दे रहे है ।


कविता १

कैसा हा-हाकार है
ये कैसा है कोलाहल कैसा हां-हाकार है ।

चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥

निहित स्वार्थ वश हिंसा बढ़ती। बहकावे में जनता मरती ।

खून की नदियाँ यहाँ उफनती। मन में संकीर्णता पनपती।

मर्यादा के ऊपर कुर्सीराग का बज्र प्रहार है।

चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥

कोई खाली पेट तड़पता। दो रोटी के लिए झगड़ता ।

बड़े पेट से दबकर मरता। घुट-घुट करके प्राण निकलता।

शोषक डंडीमार पनपता बढ़ता धन भंडार है।

चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥

गिरता है शिक्षा का स्तर। तुष्टीकरण बनाता बदतर।

सुलग उठा है शिक्षा परिसर। राजनीत छात्रों के सर पर।

मेधा कुंठित होती अब तो ज्ञान दान व्यापार है।

चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥

आरक्षी बल स्वयं अरक्षित। अपराधी खादी संरक्षित।

भुला दिए सब जनता के हित। घटनाएँ बढ़ चली अपरमित।

मुल्जिमान को खुली हवा सज्जन को कारागार है।

चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥

कैसा भी हो काम कराना। जीते को चाहे हरवाना।

मरे को भी जिंदा करवाना। दफ्तर बैंक कचहरी थाना।

काले धन के स्रोत उजागर घूसखोर व्यवहार है।

चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥

कहने को तो अभी बहुत है। अपनी भी तो बुरी नियत है।

विजय वरन कर रहा असत है। इनमें उनकी कहाँ बकत है।

निंदक नियरे नहीं चाटुकारों को मिलता प्यार है।

चारों ओर दिखाई देता भीषण नरसंहार है॥
-देवेश शास्त्री


कविता २

हुई सुहानी शाम

बाप खुशी से झूमता , पीकर प्यारे जाम।

मिला बजीफा पूत को हुई सुहानी शाम॥

हुई सुहानी शाम, काम अब राम करेंगे,

सरकारी स्कीमें पाकर पेट भरेंगे,

दंद फंद ही जीवन उनका दाम उसी से।

नाकारा ये बाप देखिये मगन खुशी से॥

देवेश शास्त्री


कविता ३

नक़ल

खुली नक़ल से देखिये, ढेरों पाये अंक।

अंकपत्र पा खुश हुए बुद्धि शून्य मन रंक॥

बुद्धिशून्य मन रंक, डंक सा मारे जग सब,

खडे निरुत्तर पूछे जाते यहाँ प्रश्न जब,

नजर चुराते दिखे चोर सम वही विकल से।

लूटे जिसने अंक भयंकर खुली नक़ल से॥

देवेश शास्त्री

कविता ४

सदाचार का पाठ पदाते युग के युग बीते हैं

दुराचार की अति के आगे सदघट सब रीते हैं

नहीं पाठ्यक्रम सफल हो सके सिद्ध प्रयोग हुए हैं

कटु औषधि के द्बारा ही मन-देह निरोग हुए हैं

असत, अधर्म, भ्रष्टता, आपाधापी बहुत गा चुके

अलंकरण सम्मान, प्रशस्ती आख़िर बहुत पा चुके

बंद करो यह पाठ पढाना बिगुल फूंक दो रन का

सत्य धर्म की ध्वजा उठाकर पालन होवे प्रण का

जब संघर्ष छेड़ दोगे तब निश्चित जे पाओगे

अगर नियति कह रहे टालते भय पर भय खाओगे

कलम मार्ग दर्शक है तो फ़िर तोप बनानी होगी

स्याही की बूंदें बम की सामर्थ्य समानी होगी

माखन-लेपन नहीं मित्र पेट्रोल छिड़कना होगा

चांदी नहीं, चर्म का जूता जमकर जड़ना होगा

लंका में चढ़कर ही रावण को सदगति देनी होगी

दह में कूद कालिया नथ यमुना पवित्र करनी होगी

असत अधर्म अकर्म दुर्ग पर चढ़ परचम लहराओ

सत्यमेव जयते सार्थक कर धर्म ध्वजा फहराओ

-देवेश शास्त्री

कविता ५

जैसी है करनी रही वैसा फल का स्वाद

सदकर्मों के गुणों की भी होती है म्याद

सुख जाने पर दुखों का निश्चित है आरम्भ

क्षणिक सफलता पर अहो क्यों है इतना दंभ

दम्भित सम्पाती उडा पाने को मार्तंड

जरे पंख व्याकुल गिरा अपनाया भूखंड

उधर जटायू साधु मन दंभ रहित हरिदास

परहित पंख कटाय के पावा प्रभु-आवास

जरे-कटे निरपक्ष भै दोनों भाई गिद्ध

दुखद सुखद तन पीर को सहज करिगाये सिद्ध

शिवि बन तन कर्तन करें मन मत होय अधीर

अंत: ब्रह्म निवास है खुद से कह लो पीर

-देवेश शास्तरी

कविता

सम्पति के अभिमान में, झूम रहे श्रीमान

नहीं समझते किसी को, चला रहे अभियान

चला रहे अभियान, मान सम्मान न जानें

दिया मूत का जला जला के, पर के तानें

कहें सुकवि देवेश चैन नहि है दम्पति को

जाना खाली हाथ, जोड़ते गिन सम्पति को

- देवेश शास्तरी

कविता ७

धन वालो के मन बुरे, रहते मद में चूर

सम्पति के अभिमान में, स्वाभिमान से दूर

स्वाभिमान से दूर, मानते धन को सरबस

धर्म-कर्म का मात्र दिखावा करते बरबस

मक्खी से भी दूध चूसते, कंगालों के

रहते मद में चूर , बुरे मन धन वालो के

-देवेश शास्त्री

कविता ८

मक्खन महंगा हो गया दूध दही है लुप्त।

मक्खनबाजी चल गई, मेधा कुंठित सुप्त।

मेधा कुंठित सुप्त, कहाँ उनकी है गिनती।

किया धरा बेकार सुनी जाती न विनती।

इनके आगे दुनियाभर के सब हैं ढक्कन।

पाना है कुछ मित्र चपेटो जमकर मक्खन॥ -देवेश शास्त्री

कविता ९

असली मक्खन है कहाँ, सिंथेटिक जब दूध

पर दुरुस्त है हाजमा, रकम हजम मय सूद

रकम हजम मय सूद , हाथ जब उनका ऊपर

काटी जमकर मौज, रोज नाचे चढ़ सर पर

मक्खनबाजी करके उपजे नेता फसली

दल बदलू जब नीति, नहीं मक्खन है असली

-देवेश शास्त्री