धू-धू करके आज जल उठी लोकतंत्र की होली।
राजनीति में सभी व्यवस्था अर्थ-तंत्र की हो ली॥
घोटालों की घुटी भांग पी नेता फिरते मस्ती में।
सर्दी में जो ताप रहे थे आग लगाकर बस्ती में॥
कितने प्रह्लादों को नित घुट-घुट कर मरना पड़ता।
खादी में लिपटे दैत्यों को देव मानना पड़ता॥
-देवेश शास्त्री
Saturday, March 10, 2012
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