जो है प्रताप के शौर्य और वैभवशाली देदीप्यमान।
वह रणस्थली सबकी प्रिय है कर सैनिक दल का रक्तपान॥
हे कातर पराधीनता नर-प्रेमी, मत थल स्पर्श करो।
धिक्कार तुम्हें करती घाटी, स्वारथ-परता की अग्नि जारो॥
हा-हा करके जो वीर मरे उनके चरित्र को याद किया।
करते करते स्मरण भूमि ने आख़िर ख़ुद ही मौन लिया॥
उस हल्दीघाटी के प्रस्तर, खंडों पर रक्तिम याद आज।
इतिहास अमर है नाम तेरा वन -वन घूमा तज राज काज ॥
लेखानावधि
२ ४ ० २
भुज वेद गगन उरु पौष शुक्ल तिथि दशमी वासर सुभग इंदु।
देवेश कथा प्रारंभ करी सर झुका सरस्वती पदारविंद ॥
पर हुई समाप्त ज्येष्ठ कृष्णी अष्टमी तैतालिस।
लम्बावधि का कारण इक-दो ही छंद लिखे हर एक दिवस॥
देवेश शास्त्री
(संस्कृत के प्रकांड विद्वान् कवि श्री श्रीश जी द्वारा रचित खंडकाव्य प्रताप विजय
पूर्वमाध्यमा के कोर्स में है श्री देवेश जी जब पूर्वमाध्यमा में पड़ते थे तब उन्होंने
अध्ययं के साथ पौष शुक्ल १० संवत २०४२ को काव्यानुवाद प्रारंभ किया था।
जो ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी संवत २०४३ विक्रम को पूर्ण हुआ।)
Thursday, July 9, 2009
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Badhiya hai shastri ji.
ReplyDeleteLalit