devesh shastri

Thursday, July 2, 2009

ख़ुद से कह लो पीर

जैसी है करनी रही वैसा फल का स्वाद
सदकर्मों के गुणों की भी होती है म्याद

सुख जाने पर दुखों का निश्चित है आरम्भ
क्षणिक सफलता पर अहो क्यों है इतना दंभ

दम्भित सम्पाती उडा पाने को मार्तंड
जरे पंख व्याकुल गिरा अपनाया भूखंड

उधर जटायू साधु मन दंभ रहित हरिदास
परहित पंख कटाय के पावा प्रभु-आवास

जरे-कटे निरपक्ष भै दोनों भाई गिद्ध
दुखद सुखद तन पीर को सहज करिगाये सिद्ध

शिवि बन तन कर्तन करें मन मत होय अधीर
अंत: ब्रह्म निवास है खुद से कह लो पीर
-देवेश शास्त्री

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