devesh shastri

Friday, July 10, 2009

दिव्य शक्ति प्रताप १० (शक्ति-प्रताप)

जिसका भाई हो आरी संगी वह शक्तिहीन कहलाता है।
बस इसी तरह राणा प्रताप निज भ्रातहीन भा पाता है ॥

वह शक्तिसिंह राणानुज था जो अरि का जाकर मित्र बना।
घर का ही निज घर की खातिर आख़िर ये शक्ती शत्रु बना॥

जब झाला ने अरि-युद्ध किया राणा घोड़ा ले भाग चला।
दो सैनिक शक्तिसिंह साथी दौडे पीछे पहचान कला॥

पीछे मुड़कर देखा राणा निज अनुज शक्तिमय यवन वीर ।
दुखपूर्ण ह्रदय अरू श्रमित गात फ़िर भी छोडा था नहीं धीर ॥

अति तीव्र वेग हयटाप शब्द अरु धूली नभ में छाती थी।
मेघाच्छादित लग रहा गगन वह दृश्य अनुपमा पाती थी॥

इतने में नाला गहन पड़ा पल में जब घोडा लाँघ गया ।
पर अपर पार जाते ही वह हय श्रमित शीघ्र परलोक गया॥
इतने में सैनिक भी आए पर उनके बाज न लाँघ सके।
तब शक्ति गया निज भ्रात तीर लख राणा रक्तिम नैन पके॥

जा शक्तिसिंह ने पैरों पड़ माफी मांगी राणाजी से।

हय दे किया फरार भ्रात सैनिक लौटे उस अवनी से॥ ।

हो गए धन्य परताप शक्ति इतिहास में नाम सुशोभित है।

करना गौरव गाथा का गान हम भारतीयों का यूँ हित है॥

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