Monday, October 31, 2011
नव जीवन
यह दीवाली मेरा ४३ वाँ जन्मदिन था लेकिननवजीवन का पहला. पूज्या माताजी ने जिस स्नेह भाव से अकेले टीका किया. वैसा दिव्य वात्सल्य ४२ जन्मदिन पर कभी अनुभव नहीं किया उनकी दृष्टि में यह मेरी जिन्दगी की ४३ वी नहीं, पहली दिवाली रही. जब २२ सितम्बर २०१० को मेरे पिताजी सर की चोट से चले गए माँ का जीवन इस लाल पर केन्द्रित हो गया जो एक वर्ष बाद २२ सितम्बर २०११ को सर की चोट से उनके दिल का टुकड़ा उसी दशा में पहुच गया तब उनकी वेदना क्या रही होगी, वे स्वयं नहीं बता रही. पति को खोकर पुत्र को उसी दशा देख बुजुर्ग माँ की क्या दशा थी? साथियो मै ये क्या लिखने लगा? सर में दर्द शुरू हो गया प्रणाम स्वीकार करें........................
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